तुम झूठ मतबोलो

 

तुम झूठ मतबोलो
तुम झूठ मतबोलो


जब सुरु हुआ

तुम्हारे और मेरे में

प्यारकी व सिलसिला

कितिना अछि लग रहीथी

आराहिथि तुम्हारी जुबांपे

कितिनी बेहेकी हुई बातें

तब बिनमेघ बारिश होती थी

दिनमें भी आंखमें सपने रहती थी

सारे बाखबास अबांतर लग रही थी

मगर जानते हुए भी सही लगरही थी

कारण तुमपे मेरा एक भरोसा थी II

 

अब तुम निकले आवागाही

तुम्हारे बोलिसे बेलाताग

सबकुछ बदल गई है पता नहीं

व सपनोंकी राजकुमार बनगई राही

आखी कियूं तुम इतिनी भयालू हो

कौन रोकरहा है मेरे साथ देनेको

जब इतिनी था दुर्बलता पहले तुम में

तो कियूं फिर रचना था ये सारे नाटक

मुझे बिच रास्तेमें छोड़जाना क्याहै सही

मुझे मार डालना तुम्हारा अधिकार हैनहीं

बात बात में बोलते जाते में ये कब बोला

तुम झूठ मत बोलो बड़ा है ये दुखदायी II

 

टिप्पणियाँ